प्रवास

Posted on August 11th, 2008
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रमेशचंद्र शाह की एक कविता प्रवास छूट गया पीछे वह सब कुछ
बांधे था जो अभी-अभी तक
टूट रही हर क्षितिज-अर्गला
कांधे अपने पहुंच सभी तक एक दौड़ती खिड़की के बल
फांद रहा यह मन उतना ही
मैं प्रवास में हूं– य Read Original story

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