रमेशचंद्र शाह की एक कविता प्रवास छूट गया पीछे वह सब कुछ बांधे था जो अभी-अभी तक टूट रही हर क्षितिज-अर्गला कांधे अपने पहुंच सभी तक एक दौड़ती खिड़की के बल फांद रहा यह मन उतना ही मैं प्रवास में हूं– य Read Original story
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