रग-ओ-पै में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिये क्या हो

Posted on June 26th, 2008
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मोहम्मद रफ़ी साहब गा रहे हैं मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ां ‘ग़ालिब’ की महानतम ग़ज़लों में शुमार की जाने वाली एक रचना. उर्दू के काफ़ी सारे मुश्किल शब्द हैं इन तीन अशआर में. आपकी सुविधा के लिये इन सब का अर्थ भी दे रहा हूं. क़द-ओ-गेसू में क़ैस-ओ-कोहकन की आज़माइश हैजहां हम हैं वहां दार-ओ-रसन की आज़माइश हैनहीं कुछ सुब्ह-ओ-ज़ुन्नार के फ़न्दे में गीराईवफ़ादारी में शैख़-ओ-बरहमन की आज़माइश हैरग-ओ-पै में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिये क्या होअभी तो तल्ख़ि-ए-काम-ओ-दहन की की आज़माइश है(<[...] Read full story

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